लोकतंत्र का चौथा स्तंभ—पत्रकारिता—कभी सत्य का प्रहरी हुआ करती थी। वह समाज की आँख थी, जो अंधेरों में भी सच को खोज निकालती थी; वह आवाज थी, जो सत्ता के गलियारों में गूंजती थी और जनता के दर्द को शब्द देती थी। किंतु आज के परिदृश्य में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या यह स्तंभ अब भी उतना ही सशक्त और निष्पक्ष है, या इसके भीतर कहीं सड़न पनप चुकी है? पत्रकारिता के पवित्र पेशे में ब्लैकमेलिंग और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिये वह संस्थान भी जिम्मेदार है जो बिना शैक्षिक योग्यता, अनुभव हीन, और बिना कुछ वेतन/मानदेय दिए ही खबरे छापते व दिखाते है । इसी के साथ खबरों के सही तथ्यों को छिपाकर राजनैतिक और सत्ताधारी और विपक्ष के इशारों पर खबरों का तोड़ मरोड कर प्रस्तुतीकरण करना पत्रकारिता के पेशे के लिये घातक होता जा रहा है
समकालीन पत्रकारिता के एक हिस्से में एक विचित्र प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है—भ्रष्टाचार और ब्लैकमेलिंग की। यह वह क्षेत्र है जहाँ खबरें अब जनहित के लिए नहीं, बल्कि निजी लाभ के लिए गढ़ी या दबाई जाती हैं। “पेड न्यूज़” का चलन, विज्ञापन के नाम पर खबरों की बिक्री, और फिर गुप्त सौदे—ये सब उस पवित्र पेशे को कलंकित करते हैं, जिसे कभी मिशन माना जाता था।
ब्लैकमेलिंग की यह प्रवृत्ति और भी खतरनाक है। जब पत्रकार अपने पास उपलब्ध सूचनाओं का उपयोग सच उजागर करने के लिए नहीं, बल्कि निजी हितों लिए करते हैं। ऐसी स्थिति में पत्रकारिता एक सेवा नहीं, बल्कि एक भय का व्यवसाय बन जाती है।
इसके अतिरिक्त, यह भी संभव है कि सरकारें इस मुद्दे को छूने से इसलिए बचती हैं क्योंकि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आंच आने का खतरा होता है। यदि सख्त कानून बनाए जाएं, तो उनका दुरुपयोग भी हो सकता है। किंतु यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब पत्रकारिता के नाम पर खुलेआम अनैतिक गतिविधियाँ चल रही हों।
यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत घातक है। जब पत्रकारिता पर से विश्वास उठता है, तो सत्य और असत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। जनता भ्रमित होती है, और लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि उसका मीडिया स्वतंत्र, निष्पक्ष और नैतिक हो।
कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का प्राणतत्व कहा जाता था—एक ऐसा सशक्त साधन, जो सत्ता और समाज के मध्य संतुलन स्थापित कर सत्य का संवाहक बनता था। वह केवल सूचना का प्रसार नहीं, अपितु विवेक, उत्तरदायित्व और नैतिकता का प्रबोधन भी था। परंतु समकालीन परिदृश्य में यह गौरवशाली परंपरा एक विचित्र विडंबना का रूप धारण कर चुकी है, जहाँ पत्रकारिता का स्वरूप “मूल्य” से “मोह” और “कर्तव्य” से “कौतुक” में परिवर्तित होता प्रतीत होता है।
आज “चौथा स्तंभ” एक ऐसे शोरगुलपूर्ण मंच में परिणत होता जा रहा है, जहाँ तथ्य गौण हैं और तात्कालिक उत्तेजना प्रधान। माइक, कैमरा और “प्रेस” का प्रतीकात्मक पट्ट—ये तीनों मानो पत्रकारिता के नवीन प्रवेशद्वार बन चुके हैं। न कोई विधिवत् प्रशिक्षण, न कोई शास्त्रीय अध्ययन, न ही संवैधानिक बोध—किन्तु आत्मविश्वास ऐसा, मानो सत्य का अंतिम निर्णायक वही हो।
यह स्थिति केवल हास्यास्पद ही नहीं, अपितु चिंताजनक भी है।
जहाँ एक ओर एक साधारण चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नियुक्ति हेतु बहुस्तरीय परीक्षाओं, साक्षात्कारों और पात्रता मानकों का पालन अनिवार्य है, वहीं दूसरी ओर समाज के बौद्धिक मार्गदर्शन का दायित्व उठाने वाली पत्रकारिता में किसी प्रकार की अनिवार्य योग्यता का अभाव—यह विरोधाभास किसी भी विवेकशील मन को उद्वेलित करने के लिए पर्याप्त है।
वर्तमान समय में “नुक्कड़ पत्रकारिता” नामक एक नवीन प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है, जो वस्तुतः पत्रकारिता के आदर्शों का अनुकरण न कर, उसका उपहास करती प्रतीत होती है। बिना तथ्य-सत्यापन के समाचारों का प्रसारण, व्यक्तियों की निजता का अतिक्रमण, और सार्वजनिक मंचों पर अशिष्ट एवं अपरिपक्व प्रश्नों की प्रस्तुति—ये सब उस गिरावट के संकेत हैं, जहाँ संवाद का स्थान सनसनी ने ले लिया है।
विडंबना यह है कि यह समूचा परिदृश्य “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के आवरण में फल-फूल रहा है। निस्संदेह, स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, किन्तु जब यह स्वतंत्रता अनुशासनविहीन होकर अराजकता में परिवर्तित हो जाए, तब वह स्वयं लोकतंत्र के लिए ही संकट का कारण बन जाती है।
अतः यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है—
क्या पत्रकारिता केवल उपकरणों का प्रयोग है, अथवा वह एक बौद्धिक और नैतिक साधना है?
क्या समाज को दिशा देने वाला वर्ग स्वयं दिशाहीन रह सकता है?
समाधान के रूप में अब केवल विमर्श पर्याप्त नहीं, अपितु संरचनात्मक परिवर्तन अनिवार्य हो गए हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश हेतु न्यूनतम शैक्षिक योग्यता का निर्धारण, विधिवत् प्रशिक्षण, तथा लाइसेंस आधारित प्रणाली का विकास—ये सभी उपाय समय की माँग हैं। इतिहास, संविधान, विधि-व्यवस्था तथा समाजशास्त्र का समुचित ज्ञान किसी भी पत्रकार के लिए अनिवार्य तत्व होने चाहिए।
इसके अतिरिक्त, भ्रामक समाचारों के प्रसार तथा ब्लैकमेलिंग जैसी प्रवृत्तियों पर कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाने चाहिए, ताकि पत्रकारिता का दुरुपयोग रोका जा सके। यह भी आवश्यक है कि “प्रेस” शब्द के उपयोग को नियंत्रित किया जाए, जिससे उसका अवमूल्यन न हो।
एक रोचक किन्तु सार्थक प्रस्ताव यह भी हो सकता है कि जब कोई पत्रकार किसी अधिकारी अथवा प्रतिष्ठित व्यक्ति से प्रश्न करे, तो उत्तरदायित्व की समानता के सिद्धांत पर उससे भी बुनियादी संवैधानिक एवं पत्रकारिता संबंधी ज्ञान का परीक्षण किया जाए। इससे संवाद का स्तर भी उन्नत होगा और उत्तरदायित्व की भावना भी सुदृढ़ होगी।
यद्यपि कुछ लोग इस परिस्थिति में कठोर प्रतिबंध अथवा “बैन” की वकालत कर सकते हैं, तथापि यह स्मरणीय है कि अतिरेक किसी भी दिशा में हितकारी नहीं होता। संपूर्ण प्रतिबंध जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित कर सकता है, वहीं पूर्ण स्वच्छंदता अराजकता को जन्म देती है। अतः संतुलन ही वास्तविक समाधान है।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि पत्रकारिता कोई तात्कालिक प्रदर्शन नहीं, अपितु दीर्घकालिक उत्तरदायित्व है। यह केवल माइक धारण करने का कौशल नहीं, बल्कि सत्य के प्रति निष्ठा, समाज के प्रति संवेदनशीलता और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का समन्वय है।
जब तक यह बोध पुनः स्थापित नहीं होता, तब तक “माइकधारी महारथी” लोकतंत्र के इस स्तंभ को सुदृढ़ करने के स्थान पर उसे भीतर ही भीतर खोखला करते रहेंगे।
और तब यह प्रश्न बार-बार प्रतिध्वनित होगा—
क्या हम पत्रकारिता को संरक्षित कर रहे हैं,
या केवल उसके नाम पर एक सुसज्जित अराजकता को वैधता प्रदान कर रहे हैं?